तीर्थंकर क्रमांक 3
श्री 1008 सम्भवनाथ भगवान
चिन्ह / लांछन
घोड़ा
सम्भवनाथ भगवान जैन धर्म के तृतीय तीर्थंकर हैं। उन्होंने संसार की नश्वरता को समझकर वैराग्य और आत्मसाधना का मार्ग अपनाया। कठोर तप एवं साधना द्वारा उन्होंने केवलज्ञान प्राप्त किया।
उनका जीवन संयम, त्याग और आत्मशुद्धि की प्रेरणा देता है। उनकी दिव्य देशना आज भी जीवों को मोक्षमार्ग की ओर प्रेरित करती है।
तीर्थंकर परिचय
देवगति से पूर्व भव का नाम
विमल वाहन
कहां से आये
अधोग्रेवेयक
गर्भ कल्याण तिथि
फाल्गुन शुक्ला अष्टमी
जन्म कल्याण की तिथि
कार्तिक शुक्ला 15
जन्म नगरी
श्रावस्ती
पिता का नाम
जीतारी
माता का नाम
सुसेना
वंश
इक्ष्वाकु
आयु
साठ लाख पूर्व
ऊंचाई
चार सौ धनुष
वर्ण
स्वर्ण
वैराग्य का कारण
मेघ विनाश
दीक्षा की तिथि
मार्गशीर्ष शुक्ला 15
दीक्षा का समय
अपरान्ह
दीक्षा नगरी
श्रावस्ती
दीक्षा वन
सहेतुक
दीक्षा पालकी
सिद्धार्था
दीक्षा वृक्ष
शालमर्ली वृक्ष
दीक्षा समय उपवास
तृतीय उपवास
सह-दीक्षित
एक हजार
अन्य महत्वपूर्ण जानकारी
प्रथम आहार नगरी
इष्टपुर
प्रथम आहार किसने दिया
सुरेन्द्र दत्त
प्रथम आहार में क्या दिया
गौ क्षीर से बने पकवान
केवल ज्ञान तिथि
कार्तिक कृष्ण चौथ
केवल ज्ञान समय
अपरांह
केवल ज्ञान का स्थान
श्रावस्ती
केवल ज्ञान वन
सहेतुक वन
केवल ज्ञान वृक्ष
शाल
समवसरण का व्यास
ग्यारह योजन
समवसरण में कुल मुनियों की संख्या
दो लाख
समवसरण में कुल आर्यिकाओं की संख्या
तीन लाख बीस हजार
कुल गणधर
एक सौ पांच
मुख्य गणधर का नाम
चारुदत्त
मुख्य आर्यिका नाम
धर्मश्री
मोक्ष की तिथि
चैत्र शुक्ला छट
मोक्ष का समय
अपरांह
मोक्ष / निर्वाण स्थान
सम्मेद शिखर (धवलकूट)
मोक्ष के समय का आसन / निर्वाण आसन
खड्गासन
भगवान के समय यक्ष
त्रिमुख
भगवान के समय यक्षिणीयां
प्रज्ञप्ति
भगवान का विशेष पद
मण्डलीक राजा